मैं अध्यापक बनूँगा !

द्रोण की बारहवीं कक्षा का परिणाम आया था। उसने पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। गणित, विज्ञान, कंप्यूटर, हर विषय में प्रदेश में अव्वल अंक थे। घर में अत्यंत खुशी का माहौल था। पिताजी मिठाई ले कर आये थे। पडोसी बधाई देने आ जा रहे थे। स्कूल के प्रधानाचार्य और कुछ अध्यापक भी घर बधाई देने आ गए थे। द्रोण के पिताजी भी राजाखेड़ा में शिक्षक ही थे।कस्बे में सब उन्हें मास्टरजी कहते थे और बहुत सम्मान देते थे। आज उनके बेटे ने कस्बे का नाम रोशन किया था।

घर के बाहर कुछ पत्रकार भी जमा हो गए थे, आखिर इतने छोटे कस्बे राजाखेड़ा के लड़के ने पहली बार प्रदेश में टॉप किया था। कोई पत्रकार द्रोण का साक्षात्कार ले रहा था, तो कोई परिवार के लोगों से प्रतिक्रिया ले रहा था। कोई पूछ रहा था कैसे तैयारी की, तो कोई पूछ रहा था की कैसा लग रहा है।

तभी पड़ोस वाले शर्मा जी ने प्रश्न किया “बेटा, क्या बनने का इरादा हैं ?”

द्रोण ने उतर दिया “पिताजी की तरह मैं भी अध्यापक बनूँगा।”

उत्तर सुनके सब लोग शांत हो गए, इतना होनहार लड़का और अध्यापक। शर्मा जी फिर बोले, “बेटा , इतने अच्छे विद्यार्थी हो, कुछ और करो, इंजीनियर बनो, डॉक्टर बनो, कस्बे का नाम रोशन करो, अध्यापक बन के क्या मिलेगा- बीस पचीस हज़ार प्रति महा।” शर्मा जी ने जैसे सबके विचार अभिव्यक्त कर दिए।

द्रोण के पिता जो सब सुन रहे थे बोले “ जब कोई अच्छा विद्यार्थी अध्यापक बनेगा ही नहीं, तो क्या खाक, पढ़ेगा इंडिया और बढ़ेगा इंडिया ?”

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A Contrarian Thinker

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